

किसानों द्वारा अपनी कृषि उपज मंडियों, सरकारी एजेंसियों, मिलों, क्रय केंद्रों एवं निजी खरीदारों को विक्रय किए जाने के उपरांत,
1. भारत का किसान लगातार अनिश्चित मौसम, बढ़ती उत्पादन लागत, कम MSP, और बाज़ार अस्थिरता से जूझ रहा है।
2. इन परिस्थितियों में किसान को फसल उत्पादन हेतु बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों से फसली ऋण लेना पड़ता है।
3. परंतु जब फसल का उचित मूल्य नहीं मिलता या प्राकृतिक आपदा आती है, तो किसान ऋण चुकाने में असमर्थ हो जाता है।
4. इसके परिणामस्वरूप किसान पर ब्याज का बोझ, रिकवरी नोटिस, कानूनी कार्यवाही, और मानसिक उत्पीड़न बढ़ता है।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार प्रदान करता है। अत्यधिक कर्ज़, ब्याज और वसूली के दबाव में जी रहा किसान सम्मानपूर्वक जीवन नहीं जी पा रहा, जो अनुच्छेद 21 का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
जब अन्य क्षेत्रों में सेवाओं/उत्पादों के विलंबित भुगतान पर ब्याज का प्रावधान है,
राष्ट्रीय संसाधनों का वितरण सार्वजनिक हित में हो
आर्थिक व्यवस्था से शोषण न हो, ब्याज आधारित फसली ऋण प्रणाली किसान के आर्थिक शोषण को जन्म देती है।
हालाँकि ये न्यायालय में सीधे लागू नहीं, परंतु सरकार के लिए नैतिक व संवैधानिक रूप से बाध्यकारी हैं। कृषि को सहायता देना राज्य का संवैधानिक दायित्व है, कोई अनुदान नहीं।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्णयों में कहा है कि: “राज्य की नीतियाँ यदि नागरिक के जीवन, आजीविका और गरिमा को प्रभावित करती हैं, तो राज्य का दायित्व है कि वह सुधारात्मक कदम उठाए।” किसानों की आत्महत्या, ऋण-दबाव और भूमि नीलामी राज्य की नीतिगत विफलता को दर्शाती है।
उपरोक्त तथ्यों व संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर हम भारत सरकार से निम्नलिखित कानूनी मांगें करते हैं:
सभी छोटे, सीमांत एवं मध्यम किसानों के समस्त फसली ऋण तत्काल प्रभाव से माफ किए जाएं
बकाया ब्याज, दंडात्मक ब्याज और वसूली प्रक्रिया समाप्त की जाए
भविष्य में किसानों को दिया जाने वाला फसली ऋण पूर्णतः ब्याज-मुक्त हो
ऋण की शर्तें सरल, पारदर्शी और किसान-अनुकूल हों
ऋण न चुका पाने के कारण किसी भी किसान के विरुद्ध रिकवरी, नीलामी या आपराधिक कार्यवाही न की जाए
यदि उपरोक्त मांगों पर उचित समयावधि के भीतर ठोस कार्रवाई नहीं की जाती, तो Kishan Majdur Ekta निम्न विधिक उपाय अपनाने के लिए बाध्य होगी:
अन्य संवैधानिक व विधिक मंचों पर किसानों के मौलिक अधिकारों की रक्षा हेतु कार्रवाई करना।