

किसानों द्वारा अपनी कृषि उपज मंडियों, सरकारी एजेंसियों, मिलों, क्रय केंद्रों एवं निजी खरीदारों को विक्रय किए जाने के उपरांत,
a. भुगतान समय पर नहीं किया जाता,
b. कई मामलों में भुगतान महीनों तक लंबित रहता है।
2. इस विलंब के कारण किसान:
a. साहूकारों से ऊँचे ब्याज पर ऋण लेने को मजबूर होते हैं,
b. कृषि लागत, पारिवारिक आवश्यकताओं और अगली फसल की तैयारी में असमर्थ हो जाते हैं।
जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्मानजनक जीवन, आजीविका और आर्थिक सुरक्षा को भी सम्मिलित करता है।
समय पर भुगतान न होना, किसानों के सम्मानजनक जीवन के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
जब अन्य क्षेत्रों में सेवाओं/उत्पादों के विलंबित भुगतान पर ब्याज का प्रावधान है,
तब किसानों को इस अधिकार से वंचित रखना मनमाना एवं भेदभावपूर्ण है।
किसानों को अपना व्यवसाय (खेती) करने का अधिकार है,
किंतु भुगतान में अनिश्चितता इस अधिकार पर अवांछित प्रतिबंध है।
राज्य का दायित्व है कि वह
आर्थिक न्याय सुनिश्चित करे,
श्रमिकों एवं किसानों को उचित पारिश्रमिक दिलाए।
उपरोक्त तथ्यों एवं संवैधानिक प्रावधानों के आलोक में, हम भारत सरकार से यह विधिक रूप से मांग करते हैं कि:
किसी भी किसान को उसकी फसल के विक्रय के पश्चात अधिकतम 7 कार्यदिवसों के भीतर पूर्ण भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
यदि निर्धारित समय-सीमा में भुगतान नहीं होता है, तो कम से कम 8% मासिक चक्रवृद्धि ब्याज किसान को अनिवार्य रूप से देय किया जाए।
जो सभी सरकारी एजेंसियों, मंडियों, मिलों एवं निजी खरीदारों पर समान रूप से लागू हो।
भुगतान में अनावश्यक विलंब करने वाले अधिकारियों/खरीदारों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान हो।
माननीय उच्च न्यायालय/सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका (PIL) दायर करना,
अन्य संवैधानिक व विधिक मंचों पर किसानों के मौलिक अधिकारों की रक्षा हेतु कार्रवाई करना।